(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 13 अनुशासनपर्व


॥ श्रीः ॥
13.28. अध्यायः 028
अथ दानधर्मपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Topics
गरुडेन नवनीतप्रक्षेपेण मन्दीभूताभ्युल्लङ्घनपूर्वकममृतरक्षिणां पक्षप्रहारेण निराकरणम्॥ 1 ॥ तथाऽमृतमाहृत्य विमति समुत्पतनम्॥ 2 ॥ तथा स्वस्योपरि इन्द्रेण वज्रे विसृष्टे तत्सन्माननायैकतनूरुहविस्रंसनम्॥ 3 ॥


Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Text

`भीष्म उवाच।

पितामहवचः श्रुत्वा गरुडः पततांवरः।
जगाम गोकुलं किञ्चिन्नवनीतजिहीर्षया॥ 13-28-1(81964)
नवनीतं तथाऽपश्यन्मथितं कलशे स्थितम्।
तदादाय ततोऽगच्छद्यतस्तद्रक्ष्यतेऽमृतम्॥ 13-28-2(81965)
स तत्र गत्वा पतगस्तिर्यक्तोयं महाबलः।
हुताशनमपक्रम्य नवनीतमपातयत्॥ 13-28-3(81966)
सो र्चिष्मान्मन्दवेगोऽभूत्सर्पिषा तेन तर्पितः।
धूमकेतुर्न जज्वाल धूममेव ससर्ज ह॥ 13-28-4(81967)
तमतीत्याशु गरुडो हृष्टात्मा जातवेदसम्।
रक्षांसि समतिक्रामत्पक्षवातेन पातयन्॥ 13-28-5(81968)
ते पतन्ति शिरोभिस्च जानुभिश्चरणैस्तथा।
उत्सृज्य शस्त्रावरणं पक्षिपक्षसमाहताः॥ 13-28-6(81969)
उत्प्लुत्य चावृतान्नागान्हत्वा चक्रं व्यतीत्य च।
अरान्तरेण शिरसा भित्त्वा जालं समाद्रवत्॥ 13-28-7(81970)
स भित्त्वा शिरसा जालं वज्रवेगसमो बली।
उज्जहार ततः शीघ्रममृतं भुजगाशनः॥ 13-28-8(81971)
तदादायाद्रवच्छीघ्रं गरुडः श्वसनो यथा।
अथ सन्नाहमकरोद्वृत्रहा विबुधैः सह॥ 13-28-9(81972)
ततो मातलिसंयुक्तं हरिभिः स्वर्णमालिभिः।
आरुरोह रथं शीघ्रं सूर्याग्निसमतेजसम्॥ 13-28-10(81973)
सोऽभ्यद्रवत्पक्षिराजं वृत्रहा पाकशासनः।
उद्यम्य निशितं वज्रं वज्रहस्तो महाबलः॥ 13-28-11(81974)
तथैव गरुडो राजन्वज्रहस्तं समाद्रवत्।
ततो वै मातलिं प्राह शीघ्रं वाहय वाजिनः॥ 13-28-12(81975)
अथ दिव्यं महाघोरं गरुडाय ससर्ज ह।
वज्रं सहस्रनयनस्तिग्मवेगपराक्रमः॥ 13-28-13(81976)
उत्सिसृक्षन्तमाज्ञाय वज्रं वै त्रिदशेश्वरम्।
तूर्णं वेगपरो भूत्वा जगाम पततांवरः॥ 13-28-14(81977)
पितामहनिसर्गेण ज्ञात्वा लब्धवरः खगः।
आयुधानां वरं वज्रमथ शक्रमुवाच ह॥ 13-28-15(81978)
वृत्रहन्नेष वज्रस्ते वरो लब्धः पितामहात्।
अतः सम्मानमाकाङ्क्षन्मुञ्चाम्येकं तनूरुहम्॥ 13-28-16(81979)
एतेनायुधराजेन यदि शक्तोसि वृत्रहन्।
हन्यास्त्वं परया शक्तया गच्छाम्यहमनामयः॥ 13-28-17(81980)
तत्तु तूर्णं तदा वज्रं स्वेन वेगेन भारत।
जघान परया शक्त्या न चैनमदहद्भृशम्॥ 13-28-18(81981)
ततो देवर्षयो राजन्गच्छन्तो वै विहायसा।
दृष्ट्वा वज्रं विवक्तं तं पक्षइपर्णेऽब्रुवन्वचः॥ 13-28-19(81982)
सुपर्णः पक्षिगरुडो यस्य पर्णे वरायुधम्।
विषक्तं देवराजस्य वृत्रहन्तुः सनातनम्॥ 13-28-20(81983)
एवं सुपर्णो विहगो वैनतेयः प्रतापवान्।
ऋषयस्तं विजानन्ति चाग्नेयं वैष्णवं पुनः॥ 13-28-21(81984)
वेदाभिष्टुतमत्यर्थं स्वर्गमार्गफलप्रदम्।
तनुपर्णं सुपर्णस्य जगृहुर्बर्हिणस्तथा॥ 13-28-22(81985)
मयूराविस्मिताः सर्वे आद्रवन्ति स्म वज्रिणम्॥' ॥ 13-28-23(81986)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अष्टाविंशोऽध्यायः॥ 28 ॥


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